भले ही मेरी बात कटाक्ष से परिपूर्ण लगे मगर अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस
और भाजपा के दामन को तार तार कर के जो २०१४ के चुनाव में अपनी पार्टी का
डंका बजाने की सोची है उसमें वे पूरी तरह विफल हो जायेंगे. उनकी पार्टी नयी नवेली
दुल्हन है. अभी उन्हें ससुराल रूपी राजनीति में एडजस्ट करने में बहुत टाइम
लगेगा...राजनीति एक दलदल है जिसमें जो डूबने की इच्छा रखता है, उसे अपने
पूरे चरित्र को दाँव पर लगाना पड़ता है. भारत भले ही औद्योगीकरण की ओर
अग्रसर है और यहाँ की भी जनता पिज़्ज़ा-बर्गर खाने
लगी है मगर अब भी जातिवाद, क्षेत्रवाद और न कितने वाद-विवाद जनता की नसों
में समाये हुए हैं ...ऐसे में २०१४ का चुनाव लड़ने और जीतने का सपना लिए
अरविन्द केजरीवाल को भी उन्हीं उम्मीदवार को खड़ा करना पड़ेगा जो प्रदेश के जाति के हिसाब से फिट बैठते हों , पर केजरीवाल की बड़ी बड़ी बातें सुनकर तो
यह नहीं लगता कि वह ऐसा करेंगे...चलिए देखते हैं उनकी हिम्मत रंग लाती भी
है या नहीं...
Wednesday, October 17, 2012
Sunday, October 14, 2012
मलाला, हमें तुमपर नाज़ है.....
मलाला, इतनी कम उम्र में तुमने अब्बू से अच्छी और सच्ची तालीम हासिल की है ..विश्व का हर एक नागरिक तुम्हारी रिकवरी की दुआ कर रहा है. अच्छी शिक्षा इंसान को बेहतर बनाती है....भारत में वेदों, पुरानों,महाकाव्यों में असीम ज्ञान का भण्डार
है, मगर हमारे पास उन्हें पढने के लिए वक़्त नहीं है...बचपन में स्कूल का टेंशन, कॉलेज में डिग्री का टेंशन और बाद में नौकरी, फिर शादी, फिर बच्चे.... फिर गृहस्थ जीवन के जाल में व्यस्त....
१२-१८ वर्ष इंसान के बहुत महत्वपूर्ण होते हैं ....इस समय दिमाग परिपक्व होने की तयारी में रहता है...इसी उम्र के पडाव पर यदि जीवन का सही मार्गदर्शन हो तो सम्पूर्ण जीवन की धारा ही अलग हो जाती है....हम औरों से अलग सोचने लगते हैं, जीवन का उद्देश्य बदल जाता है.....आज हमारे समाज में मलाला जैसी सोच की जरुरत है, कुछ करने का जज्बा, किसी और के लिए जीने का जज्बा......
अंशुमान तिवारी जी, अर्थशाश्त्र के अद्भुत ज्ञाता
आज उन्हें मैं एक पत्र लिख रहा हूँ :-
सर,
मैं आपके लेखों का नियमित पाठक हूँ. आपके आर्थिक लेखो में मेरी भरपूर जिज्ञासा रहती है. कुछ सवाल हैं जो आपसे पूछने हैं.
चीन अपने सस्ते लेबर के लिए जाने जाना वाला देश है. विश्व भर की कई कम्पनियां चीन आकर अपने उत्पाद का उत्पादन करती हैं, भले ही उसमे लेबल लगा हो मैन्युफैक्चर्ड इन चाइना या मेड इन चाइना. खैर, मुझे बस आपसे ये जानना है कि प्रोडक्ट की विश्वसनीयता को हम कैसे परखेंगे कि हमारे द्वारा ख़रीदा गया नोकिया मोबाइल सेट या अन्य प्रोडक्ट में क्या अविश्वसनीय और गैर टिकाऊ चीनी कल-पुर्जे मिले रहेते हैं.
आपके उत्तर का इंतज़ार रहेगा
आपका आभारी,
संसार लोचन
Saturday, October 6, 2012
हिन्दू धर्म को ठेस
अपने बड़बोलेपन से बाज नहीं आने वाले केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने एक बार फिर बवाल खड़ा कर दिया है. मंदिर और टॉयलेट की तुलना ने हिन्दू धर्म को ठेस पहुंचाई है. सच भी है , कुछ बोलने से पहले इंसान को १०० बार सोच लेना चाहिए. भाजपा ने, ही नहीं कांग्रेस ने भी धार्मिक विश्वास को ठेस पहुँचाने वाले बयानों से बाज आने की नसीहत उन्हें दे डाली है. इतने बड़े पद पर आसीन जयराम को ऐसे बयानों से बचना चाहिए. धार्मिक ठेस बहुत दुखदायी होती है.
Thursday, July 19, 2012
मीडिया युद्ध
भले ही आउट लुक मैग्जीन ने भड़ास निकाल ली हो ओबामा को अंडर अचीवर साबित कर के मगर सच्चाई छुप नहीं सकती जमाने के उसूलों से, के खुशबू आ नहीं सकती कागज़ के फूलों से. हाँ ये सच है की विश्व का दादा किसी भी देश को अपमानित करने से नहीं चूकता और ये कहकर बच कर निकलना चाहता है की अपमानित देश इसे सिर्फ क्रिटीसीजम समझें और अपने आप में सुधार लायें. मगर टाइम मैग्जीन के स्टेटमेंट को भूल कर आँख बंद करके यदि ये सोचा जाए कि मनमोहन ने हमें दिया क्या एक प्रधानमन्त्री के रूप में तो आभास हो जाएगा कि इस बन्दे ने देने की परिभाषा बदल कर हमें सच में बहुत कुछ दिया है- आसमान छूती मेहंगायी, ग़रीबी, आर्थिक मंदी और न जाने क्या क्या! अर्थशास्त्र के महाज्ञानी ने पूरे देश को ऐसी स्थिति में ला कर छोड़ दिया है की साँस लेना भी मुश्किल है। खैर अब उनके निक्कम्मेपन को गिनाने से कोई फायदा नहीं क्योंकि देश की जनता इससे पूरी तरह से वाकिफ है . मेरा उद्देश्य तो बस ये कहना था कि कुत्तों का काम सिर्फ भौंकना होता है मगर हाथी का काम सुनी को अनसुनी करना और साथ-साथ बिना सुने हुए स्वयं में सुधार लाना भी होता है। मगर संप्रग सरकार को गीदड़ से हाथी बनने में अभी वक़्त है।
Monday, July 16, 2012
सेक्युलर विभाजनकारी मानसिकता
दुनिया इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर चुकी है, किन्तु मुस्लिम समुदाय का अधिकांश भाग अभी भी मध्यकालीन मान्यताओं की जकडन में है तो इसकी बड़ी जिम्मेदारी सेकुलरिस्टों की है, जो वोट बैंक की राजनीति के कारण मदरसा तालीम, उर्दू, बहुविवाह , अनियंत्रित प्रजनन आदि मुद्दों पर कट्टरपंथियों का समर्थन करते आये हैं. अभी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान मुस्लिम समाज को अपने पाले में करने के लिए सेक्युलर दलों में होड़ लगी थी. चुनाव से ठीक पूर्व केंद्र सरकार ने पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित २७ प्रतिशत आरक्षण में से अल्पसंख्यकों को ४.५ फीसदी आरक्षण देने का निर्णय लिया. चुनाव के बिच में कांग्रेस के एक वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री ने मजहब के आधार पर मुस्लिमों को अलग से आरक्षण देने की घोषणा क्या की , अन्य छिटपुट दलों ने भी आरक्षण मुस्लिम आबादी के अनुपात में करने तक का वादा कर डाला. हाल ही में पंचायती चुनाव को देखते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के करीब तीस हजार से अधिक इमामों को सम्मान के तौर पर हर महीने २५०० रुपये देने, इमामों को निजी घर बनाने के लए सरकार की ओर से भूमि देने और भवन निर्माण के लिए आर्थिक सहायता देने के अलावा अल्पसंख्यकों के लिए बीस हज़ार घर बनाने, अल्पसंख्यको के रोजगार के लिए रोजगार बैंक स्थापित करने और उनकी शिक्षा के लिए मदरसों की स्थापना की घोषणा की थी. समाज के समग्र विकास को ताक़ पर रखकर जब वोट बैंक के लिए इस तरह एक समुदाय पर विशेष कट्टरवादी विचारधारा को पोषित किया जाएगा तो विकृतियाँ ही पैदा होंगी. जिस देश में अल्पसंख्यकों के मजहबी फ़र्ज़ को हज सब्सिडी के नाम पर सरकार पूरा कराती हो उस देश के बह्संख्यकों की भावनाओं के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों? मुस्लिम लीग के जिन नेताओं ने बटवारें का समर्थन किया वे विभाजन के बाद पाकिस्तान नहीं गए. वे रातोरात कांग्रेस में शामिल हो गए. पार्टी बदलने से उनकी मानसिकता नहीं बदली. वही विभाजनकारी मानसिकता सेक्युलरवाद के नाम पर पोषित हो रही है, जिसकी तार्किक परिणति बागपत खाप का तालिबानी फरमान है.
Sunday, July 15, 2012
'बजट के भीतर' है- शौचालय
मोंटेक सिंह अहलूवालिया का शौचालय. योजना आयोग भवन के दो शौचालयों को चमकाने पर ३५ लाख रूपये कर्च किये गए हैं. यह वही मोंटेक और उनका आयोग है जो कहता है कि जो २८ रुपये एक दिन में खर्च करता है, वह गरीब नहीं है. देश के गरीबों को लेकर अपराधिक और अमानवीय रवैया अपनाने वाला आयोग अपने शौचालय के सुन्दरीकरण पर जितना चाहे खर्च कर सकता है. सब कुछ 'बजट के भीतर' है.
जैसे ही यह खबर सामने आई कि योजना भवन के शौचालय के सुन्दरीकरण पर ३५ लाख खर्च हुए हैं, मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर चौतरफा हमले शुरू हो गए. जैसी कि उम्मीद थी, वे इस खर्च के बचाव में आये और पूरी तरह से यह स्पष्ट कर दिया कि देश की योजना बनाने वाला यह व्यक्ति देश को लेकर कितना असंवेदनशील है.
मोंटेक ने न केवल मीडिया के सामने धन के आपराधिक दुरुपयोग को उचित ठहराया बल्कि इसकी आलोचना करने के लिए मीडिया की चुटकी भी ली. फिजूलखर्च का विरोध उनके लिए दुर्भाग्यपूर्ण है और ३५ लाख ख़र्च करना जरूरत. यह योजना आयोग के उपाध्यक्ष की बेशर्मी और असंवेदनशीलता की पराकाष्ठा है. उनके इस काम की चारो तरफ से निंदा हुई है लेकिन उसका क्या लाभ. मोंटेक को तो इस बात का अहसास भी नहीं है कि एक गरीब देश में ऐसी फिजूलखर्ची उचित नहीं है. बल्कि उलटे वह इसे उचित ही ठहरा रहे हैं. कांग्रेस ने भी उनका बचाव करने से मन कर दिया है और इस बात को रखांकित किया है कि सार्वजनिक धन का ख़र्च इस तरह से उचित नहीं है.
मगर कांग्रेस की सीख का मोंटेक सिंह अहलूवालिया पर क्या फर्क पड़ता है. वे प्रधानमंत्री के आदमी हैं और अमेरिका में उनके आका उन्हें भारत में जमाये रखना चाहते हैं. चाहे वे अपने शौचालय के लिए कितना भी धन क्यूँ न ख़र्च करें. वे कांग्रेस के नियंत्रण में नहीं हैं. वे वित्त मंत्री बन रहे थे, कांग्रेस ने रोक दिया, कांग्रेस बस इतना ही कर सकती थी. आने वाले चुनाओं में अकेले मोंटेक कांग्रेस पर भरी पड़ेंगे, और रुपये वाली करतूत कांग्रेस के खिलाफ एक बड़ा मुद्दा बनेगी.
अर्से से वे मनमोहन सिंह और अमेरिका के प्रिय है और मनमोहन तथा उनके आका अमेरिका ने मोटेंक को भारतीय योजना आयोग का उपाध्यक्ष बना रखा है. आज भी मोटेंक बिना नागा किये अमेरिका जाते हैं. महीने में एक दो बार वे अमेरिका में ही पाये जाते हैं और न जाने क्या करके लौट आते हैं. फिर कांग्रेस में इतनी हिम्मत नहीं है कि वह उल जुलूल हरकतें करनेवाले मोंटेक का कान पकड़कर उन्हें योजना आयोग का दरवाजा दिखा दे. न जाने कब से वे अपने मानसिक सोच (शौच) से पूरे देश को गंदा किये जा रहे हैं और हम हैं कि उनकी हर गंदगी अपने सिर माथे धरे घूम रहे हैं.
वैसे, राजनीतिक दल भले ही मोंटेक की आलोचना कर रहे हैं लेकिन इस देश का आम आदमी के मन में एक सवाल यह भी आ रहा है कि काश! पूरा देश मोंटेक का शौचालय हो जाता. आखिर में एक सवाल तो ज्यों का त्यों है कि अपने शरीर का मैला त्यागने के लिए मोंटेक ने ३५ लाख ख़र्च किया है, मन का मैल दूर करने के लिए कितना ख़र्च करेंगे?
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