Wednesday, October 24, 2012

यश चोपड़ा चले गए

यश चोपड़ा चले गए। जाते तो सभी हैं। आप भी जाएंगे और हम भी। पर, यश चोपड़ा जिस तरह से गए, उस तरह उनको नहीं जाना चाहिए था। वे बीमार थे। अस्पताल में बिस्तर पर सोए थे। और सोते सोते ही सदा के लिए सो गए। वे हंसते खेलते जाते..., फिल्में बनाते हुए जाते... या फिर फिल्मों के विकास के लिए सरकार से लड़ते हुए जाते। तो, शायद ज्यादा ठीक लगता।

लेकिन मौत तो मौत होती है। वह जब आ ही जाती है, तो कभी भी, कैसे भी, कहीं से भी किसी को भी अपने साथ लेकर चली जाती है। यश चोपड़ा को भी ले गई। लेकिन दुनिया को बहुत दुखी कर गई। दुखी इसलिए, क्योंकि उनकी फिल्मों में जिंदगी हुआ करती थी। जिंदगी से किस तरह प्यार किया जाता है, यह हुआ करता था। प्यार की परवानगी हुआ करती थी। और पूरे परवान पर चढ़ी जिंदगी की वो जंग भी हुआ करती थी, जिसको जीत कर जिंदगी और बड़ी हो जाया करती थी।

दुनिया असकर लोगों की मौत के बाद उनमें महानता की तलाश करती है। लेकिन यश चोपड़ा जीते जी महान हो गए थे। क्योंकि जिंदगी की असलियत को पूरी ईमानदारी के साथ परदे पर पेश करके आम आदमी के मन से उन्होंने अपना रिश्ता जोड़ा। वे बड़े फिल्म निर्माता थे। बहुत बड़े निर्माता। इतने बड़े कि उनके जीते जी तो उनकी बराबरी कोई नहीं कर सका। लेकिन इससे भी बड़ी बात यह है कि यश चोपड़ा जितने बड़े फिल्म निर्माता थे, उससे भी ज्यादा बड़े इंसान थे। उनको इंसानियत से मोहब्बत थी। और मोहब्बत को इंसानियत के नजरिए से देखना उनको किसी भी और इंसान से ज्यादा बेहतरीन तरीके से आता था। यही वजह थी कि यश चोपड़ा की फिल्मों में जिंदगी की तलाश नहीं करनी पड़ती थी। बल्कि जिंदगी खुद अपने को उनकी फिल्मों से जोड़ती नजर आती थी।

Wednesday, October 17, 2012

जातिवाद की जकड़न

भले ही मेरी बात कटाक्ष से परिपूर्ण लगे मगर अरविन्द केजरीवाल ने कांग्रेस और भाजपा के दामन को तार तार कर के जो २०१४ के चुनाव में अपनी पार्टी का  डंका बजाने की सोची है उसमें वे  पूरी  तरह विफल हो जायेंगे. उनकी पार्टी नयी नवेली दुल्हन है. अभी उन्हें ससुराल रूपी राजनीति में एडजस्ट करने में बहुत टाइम लगेगा...राजनीति एक दलदल है जिसमें जो डूबने की इच्छा रखता है, उसे अपने पूरे चरित्र को दाँव पर लगाना पड़ता है. भारत  भले ही औद्योगीकरण  की  ओर अग्रसर  है और यहाँ  की भी जनता पिज़्ज़ा-बर्गर खाने  लगी  है मगर अब भी जातिवाद, क्षेत्रवाद और न कितने वाद-विवाद  जनता की नसों में समाये हुए हैं ...ऐसे में २०१४ का चुनाव लड़ने और जीतने का सपना लिए अरविन्द केजरीवाल को भी उन्हीं उम्मीदवार को खड़ा करना पड़ेगा जो प्रदेश के जाति  के हिसाब से फिट बैठते हों , पर केजरीवाल की  बड़ी बड़ी बातें  सुनकर तो यह नहीं लगता कि  वह ऐसा करेंगे...चलिए देखते हैं उनकी हिम्मत रंग लाती भी है या नहीं...

Sunday, October 14, 2012

मलाला, हमें तुमपर नाज़ है.....


मलाला, इतनी कम उम्र में तुमने अब्बू से अच्छी और सच्ची तालीम हासिल की है ..विश्व का हर एक नागरिक तुम्हारी रिकवरी की दुआ कर रहा है. अच्छी शिक्षा इंसान को बेहतर बनाती है....भारत में वेदों, पुरानों,महाकाव्यों में असीम ज्ञान का भण्डार 
है, मगर हमारे पास उन्हें पढने के लिए वक़्त नहीं है...बचपन में स्कूल का टेंशन, कॉलेज में डिग्री का टेंशन और बाद में नौकरी, फिर शादी, फिर बच्चे.... फिर गृहस्थ जीवन के जाल में व्यस्त....

१२-१८ वर्ष इंसान के बहुत महत्वपूर्ण होते हैं ....इस समय दिमाग परिपक्व होने की तयारी में रहता है...इसी उम्र के पडाव पर यदि जीवन का सही मार्गदर्शन हो तो सम्पूर्ण जीवन की धारा ही अलग हो जाती है....हम औरों से अलग सोचने लगते हैं, जीवन का उद्देश्य बदल जाता है.....आज हमारे समाज में मलाला जैसी सोच की जरुरत है, कुछ करने का जज्बा, किसी और के लिए जीने का जज्बा......

अंशुमान तिवारी जी, अर्थशाश्त्र के अद्भुत ज्ञाता

कल ही अंशुमान  तिवारी जी, जो अर्थशाश्त्र के अद्भुत ज्ञाता हैं,  उनका लेख पढ़ रहा था. उन्होंने बहुत खूब कहा - "यदि दुनिया में चिंताओं को नापने का कोई ताजा सूचकांक बनाया जाए तो डगमगाता अमे‍रिका और डूबता यूरोप उसमें सबसे ऊपर नहीं होगा।  दुनिया तो अब थमते चीन को लेकर बेचैन है। ग्‍लो्बल ग्रोथ का यह टर्बोचार्ज्‍ड इंजन धीमा पड़ने लगा है। चीन अब केवल एक देश का ही नाम नही बलिक एक नए किस्‍म की ग्‍लोबल निर्भरता का नाम भी है। दुनिया की दूसरी सबसे बडी अर्थव्‍यवस्‍था की  फैक्ट्रियों में बंद मशीनों को देख कर ब्राजील, अफ्रीका और अमेरिका की खदानों से लेकर ताईवान व कोरिया के इलेक्‍ट्रानिक केंद्रो तक डर की लहर दौडने लगी है। चीन की ग्रोथ में गिरावट दुनिया की सबसे बड़ी बहुआयामी चुनौती है। सुस्‍त पडता चीन  विश्‍व की कई कंपनियों को दीवालिया कर देगा।"


आज उन्हें मैं एक पत्र लिख रहा हूँ :-

सर,
मैं आपके लेखों का नियमित पाठक हूँ. आपके आर्थिक लेखो में मेरी भरपूर जिज्ञासा रहती है. कुछ सवाल  हैं जो आपसे पूछने  हैं.
चीन अपने सस्ते लेबर के लिए जाने जाना वाला देश है. विश्व भर  की कई कम्पनियां चीन आकर अपने उत्पाद का उत्पादन करती हैं, भले ही उसमे लेबल लगा हो मैन्युफैक्चर्ड इन चाइना या मेड इन चाइना. खैर, मुझे बस आपसे ये जानना है कि प्रोडक्ट की विश्वसनीयता को हम कैसे  परखेंगे कि हमारे द्वारा ख़रीदा गया नोकिया मोबाइल सेट या अन्य प्रोडक्ट में क्या अविश्वसनीय और गैर टिकाऊ चीनी कल-पुर्जे मिले रहेते हैं.
आपके उत्तर का इंतज़ार रहेगा
आपका आभारी,
संसार लोचन 


Saturday, October 6, 2012

हिन्दू धर्म को ठेस

अपने बड़बोलेपन से बाज नहीं आने वाले केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने एक बार फिर बवाल खड़ा कर दिया है. मंदिर और टॉयलेट की तुलना ने हिन्दू धर्म को ठेस पहुंचाई  है. सच भी है ,  कुछ बोलने से पहले इंसान को १०० बार सोच लेना चाहिए. भाजपा ने, ही नहीं कांग्रेस ने भी धार्मिक  विश्वास को ठेस पहुँचाने  वाले बयानों से बाज आने की नसीहत उन्हें दे डाली है. इतने बड़े पद पर आसीन जयराम को ऐसे बयानों से बचना चाहिए. धार्मिक ठेस बहुत दुखदायी होती है. 

Thursday, July 19, 2012

मीडिया युद्ध

भले ही आउट लुक मैग्जीन ने  भड़ास निकाल ली  हो ओबामा को अंडर अचीवर साबित  कर के  मगर सच्चाई छुप नहीं सकती जमाने के उसूलों से, के खुशबू आ नहीं सकती कागज़ के फूलों से. हाँ ये सच है की विश्व का दादा  किसी भी देश को अपमानित करने से  नहीं चूकता और ये कहकर बच कर निकलना चाहता है की अपमानित देश इसे सिर्फ क्रिटीसीजम समझें और अपने आप में सुधार लायें. मगर टाइम मैग्जीन के स्टेटमेंट को भूल कर आँख बंद करके यदि ये  सोचा जाए कि  मनमोहन  ने हमें  दिया क्या एक प्रधानमन्त्री के रूप में  तो आभास हो जाएगा कि  इस बन्दे ने देने की  परिभाषा  बदल कर हमें  सच में बहुत कुछ दिया है-  आसमान छूती मेहंगायी, ग़रीबी, आर्थिक मंदी और न जाने क्या क्या! अर्थशास्त्र के महाज्ञानी ने पूरे देश को ऐसी स्थिति में ला कर छोड़ दिया है की साँस लेना भी मुश्किल है। खैर अब उनके निक्कम्मेपन को गिनाने से  कोई फायदा नहीं क्योंकि देश की जनता   इससे पूरी तरह से वाकिफ है . मेरा उद्देश्य तो बस ये कहना  था कि  कुत्तों का काम सिर्फ भौंकना होता है मगर हाथी का काम सुनी को अनसुनी करना और साथ-साथ बिना सुने हुए स्वयं में सुधार लाना  भी होता है। मगर संप्रग सरकार को गीदड़ से हाथी बनने में अभी वक़्त  है। 

Monday, July 16, 2012

सेक्युलर विभाजनकारी मानसिकता

दुनिया इक्कीसवीं सदी में प्रवेश  कर चुकी है, किन्तु मुस्लिम समुदाय का अधिकांश भाग अभी भी मध्यकालीन मान्यताओं की जकडन में है तो इसकी बड़ी जिम्मेदारी सेकुलरिस्टों की है, जो वोट बैंक की राजनीति के कारण  मदरसा तालीम, उर्दू, बहुविवाह , अनियंत्रित प्रजनन आदि मुद्दों पर कट्टरपंथियों का समर्थन करते आये हैं. अभी उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के दौरान  मुस्लिम समाज को अपने पाले में करने के लिए सेक्युलर दलों  में होड़ लगी थी. चुनाव से ठीक पूर्व केंद्र सरकार ने पिछड़े वर्ग के लिए निर्धारित २७ प्रतिशत आरक्षण में से अल्पसंख्यकों को ४.५ फीसदी  आरक्षण  देने का निर्णय लिया. चुनाव के बिच में कांग्रेस के एक वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री ने मजहब के आधार पर मुस्लिमों को अलग से  आरक्षण  देने की घोषणा क्या की ,  अन्य छिटपुट दलों ने भी   आरक्षण  मुस्लिम आबादी के अनुपात में करने तक का वादा कर डाला. हाल ही में पंचायती चुनाव को देखते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने राज्य के करीब तीस हजार से अधिक इमामों को सम्मान के तौर पर हर महीने २५०० रुपये देने, इमामों को निजी घर बनाने के लए सरकार की ओर से  भूमि देने और भवन निर्माण के लिए आर्थिक सहायता देने के अलावा अल्पसंख्यकों के लिए बीस हज़ार घर बनाने, अल्पसंख्यको के रोजगार के लिए रोजगार बैंक स्थापित करने और उनकी शिक्षा  के लिए मदरसों की स्थापना की घोषणा की थी. समाज के समग्र विकास को ताक़ पर रखकर जब वोट बैंक के लिए इस तरह एक समुदाय पर विशेष कट्टरवादी विचारधारा को पोषित किया जाएगा तो विकृतियाँ ही पैदा होंगी. जिस देश में अल्पसंख्यकों के मजहबी फ़र्ज़ को हज सब्सिडी के नाम पर सरकार पूरा कराती हो उस देश के बह्संख्यकों की भावनाओं के साथ ऐसा खिलवाड़ क्यों? मुस्लिम  लीग के जिन नेताओं ने बटवारें का समर्थन किया वे विभाजन के बाद पाकिस्तान नहीं गए. वे रातोरात कांग्रेस में शामिल हो गए. पार्टी बदलने से उनकी मानसिकता नहीं बदली. वही विभाजनकारी मानसिकता सेक्युलरवाद   के नाम पर पोषित हो रही है, जिसकी तार्किक परिणति  बागपत खाप का तालिबानी फरमान है.